शिकारपुर की पावन धरती पर हर साल निकलती है माँ काली की भव्य गस्त। डमरू की थाप, नगाड़ों की गूंज और भक्तों के जयकारों से पूरा नगर गूंज उठता है। चारों तरफ सिर्फ एक ही आवाज़ "काली माता की… जय…!" सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु, हाथों में मशालें, झंडे और ढोल-नगाड़ों के साथ, माँ काली की झांकी के आगे बढ़ते हैं। भक्ति, उत्साह और परंपरा का यह अनोखा संगम देखने लायक होता है।जब माँ काली की शोभा गस्त नगर की गलियों से होकर निकलती है, तो घर-घर के दरवाज़े और दिल माँ के दर्शन के लिए खुले होते हैं। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएँ सभी श्रद्धा भाव से माँ के जयकारे लगाते हैं। यह गस्त सिर्फ आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि शिकारपुर की एकता, परंपरा और भक्ति का अद्भुत संगम है। "जय माँ काली… जय माँ काली…" की गूंज जब आसमान तक पहुँचती है, तो लगता है जैसे स्वयं माँ अपने भक्तों का आशीर्वाद देने धरती पर उतर आई हों।
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