वो थप्पड़... जो आज भी गूंजता है।
यह कोई कहानी नहीं...
एक सच्चा किस्सा है — उस बच्चे का,
जो बस प्यार चाहता था... पर उसे मिला थप्पड़
आज सुबह...
मम्मा को मुझे उठाने के लिए एक बार भी नहीं पुकारना पड़ा।
पता नहीं क्यों...
पर मैं खुद ही जाग गया।
चुपचाप उठा... चेहरा धोया...
और स्कूल की ड्रेस पहन ली।
मम्मा रसोई में थीं —
आवाज़ दी...
“बेटा, टिफ़िन में क्या दूं?”
पर आज... न जाने क्यों... मैंने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने जो रख दिया... वही रख लिया।
देखा भी नहीं... कि अंदर क्या है।
आज स्कूल बस छूट जाने का भी डर नहीं था...
बस एक बेचैनी थी —
घर से जल्दी निकल जाने की।
मैंने मम्मा को “बाय” कहा,
मुस्कुराने की कोशिश की...
पर वो मुस्कान...
बस होंठों तक रह गई...
दिल तक नहीं पहुंची।
लिफ़्ट से नीचे उतरा...
रास्ते में कई बच्चे दिखे —
किसी के गाल गुलाबी थे,
किसी के बाल हवा में उड़ रहे थे,
किसी के हाथों में झूलता टिफ़िन...
मैं बस देखता जा रहा था...
और मन में एक ही सवाल घूम रहा था...
क्या इनके पापा भी इन्हें मारते होंगे...?
क्या इनके गालों पर भी कभी वो थप्पड़ पड़ा होगा...
जैसा कल रात मेरे गाल पर पड़ा था...?
क्या इनके कानों में भी अब तक गूंजती होगी वो “थप्प” की आवाज़...
जो सिर्फ गाल पर नहीं,
सीधे दिल पर लगी थी।
उस थप्पड़ के बाद...
पापा बहुत कुछ बोले थे,
पर सच कहूं...
कुछ सुनाई नहीं दिया।
बस कानों में गूंजती रही वही आवाज़...
और आंखों से...
चुपचाप गिरते रहे आंसू।
पापा हैं...
यकीन है... उन्होंने कुछ सोचकर ही मारा होगा...
पर क्या समझा कर नहीं कहा जा सकता था...?
क्या मेरी गलती... सच में इतनी बड़ी थी...
कि मुझे थप्पड़ खाना पड़ा?
स्कूल पहुंचा...
सब हंस रहे थे, खेल रहे थे...
मैं भी हंसने की कोशिश करता रहा...
पर गाल अब भी जल रहे थे...
और अंदर कहीं...
दिल चुपचाप रो रहा था।
शाम को जब घर लौटा...
मम्मा ने दरवाज़ा खोला...
उनकी आंखों में सवाल थे...
पर शब्द नहीं।
मैं बस... उनके गले लग गया...
और वहीं... रो पड़ा।
मम्मा का आँचल...
मेरे आंसुओं से भीग गया।
उन्होंने कुछ नहीं कहा...
बस मेरा सिर सहलाती रहीं...
जैसे कह रहीं हो - रोओ मत सब ठीक हो जायेगा
उसी पल समझ आया...
थप्पड़ का दर्द... गाल पर नहीं रहता।
वो तो दिल में बस जाता है...
और वहीं से...
हर दिन थोड़ा-थोड़ा...
बचपन मरता जाता है।
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